वॉशिंगटन/तेहरान | अंतरराष्ट्रीय डेस्क
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ संभावित एयरस्ट्राइक समेत विभिन्न सैन्य विकल्पों की समीक्षा की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के प्रतिनिधि Geneva में परमाणु कार्यक्रम को लेकर वार्ता के अगले दौर की तैयारी कर रहे हैं। कूटनीतिक बातचीत और सैन्य तैयारी—दोनों समानांतर चलने से वैश्विक समुदाय की चिंता बढ़ गई है।
‘सीमित हमला’ बनाम कूटनीतिक समाधान: व्हाइट हाउस में मंथन
अमेरिकी प्रशासन के भीतर “सीमित और लक्षित” हमले से लेकर व्यापक दबाव रणनीति तक पर विचार हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति Trump के करीबी सलाहकार—Jared Kushner और Steve Witkoff—ने संभावित जोखिमों और लाभों पर इनपुट दिया है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सैन्य कदम से पहले क्षेत्रीय ठिकानों की सुरक्षा, सहयोगी देशों की भूमिका और ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर असर का आकलन अनिवार्य होगा।
ईरान की कड़ी चेतावनी, क्षेत्र में सुरक्षा सतर्कता
तेहरान ने संकेत दिया है कि किसी भी हमले का “निर्णायक जवाब” दिया जाएगा। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने Lebanon स्थित दूतावास से गैर-आवश्यक कर्मचारियों की वापसी शुरू की है। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों और तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त निगरानी बढ़ाई गई है, ताकि संभावित अस्थिरता का प्रभाव सीमित रखा जा सके।
ये भी पढ़े: 2026 Maruti Cervo: बजट हैचबैक सेगमेंट में नई हलचल, शानदार माइलेज और आधुनिक फीचर्स के साथ वापसी की तैयारी
जेनेवा वार्ता: क्या निकलेगा कोई मध्य मार्ग?
परमाणु कार्यक्रम पर मतभेद लंबे समय से चले आ रहे हैं। अमेरिका पूर्ण पारदर्शिता और कठोर निगरानी तंत्र की मांग करता है, जबकि ईरान अपने संप्रभु अधिकारों और प्रतिबंधों में राहत पर जोर देता रहा है। Geneva में होने वाला अगला दौर इस गतिरोध को तोड़ने की दिशा में अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का आकलन है कि चरणबद्ध भरोसा-निर्माण उपाय—जैसे सीमित संवर्धन पर अस्थायी रोक, निरीक्षण की बढ़ी पहुंच और मानवीय प्रतिबंधों में आंशिक राहत—तनाव घटाने का व्यावहारिक रास्ता बन सकते हैं।
वैश्विक असर: ऊर्जा बाजार और कूटनीति पर नजर
मध्य-पूर्व में किसी भी सैन्य टकराव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग बीमा प्रीमियम और उभरते बाजारों की मुद्रा पर पड़ सकता है। भारत सहित एशियाई अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इसलिए स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है। कूटनीतिक हल निकलता है तो बाजारों में स्थिरता लौट सकती है; अन्यथा अस्थिरता की आशंका बनी रहेगी।
निष्कर्ष
अमेरिका-ईरान संबंध निर्णायक मोड़ पर हैं। सैन्य विकल्पों की समीक्षा और वार्ता की मेज—दोनों समानांतर चल रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या कूटनीति तनाव पर भारी पड़ती है या क्षेत्र एक नए टकराव की ओर बढ़ता है।
ये भी पढ़े: BAFTA 2026 में भारतीय सिनेमा का जलवा: ‘Boong’ ने जीता बेस्ट चिल्ड्रन एंड फैमिली फिल्म अवॉर्ड