अमेरिका का बड़ा बयान: पाकिस्तान को ‘right to defend itself’, अफगान तालिबान पर सख्त रुख

अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह पाकिस्तान के ‘right to defend itself’ का समर्थन करता है, जिसके तहत वह अफगानिस्तान की जमीन से होने वाले हमलों के खिलाफ आत्म-रक्षा की कार्रवाई कर सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और तालिबान शासित अफगानिस्तान के बीच सीमा पर तनाव तेजी से बढ़ा है और दोनों ओर से सैन्य गतिविधियों की खबरें सामने आई हैं।

क्या कहा अमेरिका ने और क्यों है यह अहम?

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा कि किसी भी देश को अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का अधिकार है। वॉशिंगटन ने साथ ही क्षेत्र में बढ़ती हिंसा पर चिंता भी जताई और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। अमेरिका का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदल चुके हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान पाकिस्तान को कूटनीतिक समर्थन देने का संकेत है, खासकर तब जब इस्लामाबाद लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अफगान क्षेत्र में मौजूद तत्व पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं।

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सीमा पर बढ़ता तनाव

हाल के दिनों में पाकिस्तान ने अफगान सीमा से लगे इलाकों में हवाई कार्रवाई की है। पाकिस्तान का दावा है कि ये हमले उन ठिकानों पर किए गए जहां से उग्रवादी संगठन सक्रिय थे। दूसरी ओर, अफगान तालिबान ने नागरिक हताहतों का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की निंदा की है। इससे दोनों देशों के रिश्तों में और खटास आई है।

सीमा पर बार-बार होने वाली झड़पें यह संकेत देती हैं कि समस्या केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक भी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि संवाद की प्रक्रिया मजबूत नहीं हुई तो यह तनाव लंबे समय तक जारी रह सकता है।

क्षेत्रीय और वैश्विक असर

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर असर डाल सकता है। यह इलाका पहले से ही आतंकवाद, शरणार्थी संकट और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में अमेरिका का बयान केवल एक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का संकेत भी है।

आगे क्या?

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि दोनों देश सैन्य कार्रवाई के बजाय वार्ता को प्राथमिकता दें। विश्लेषकों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान केवल सीमा प्रबंधन, खुफिया सहयोग और राजनीतिक विश्वास बहाली से ही संभव है।

इस पूरे घटनाक्रम पर वैश्विक निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह मामला न सिर्फ दो देशों के संबंधों से जुड़ा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी रणनीति से भी सीधा संबंध रखता है।

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