‘Kennedy’ मूवी रिव्यू: सिस्टम के सड़ांध भरे अंधेरे में मुक्ति की तलाश

निर्देशक: अनुराग कश्यप
मुख्य कलाकार: राहुल भट्ट, सनी लियोन
शैली: नियो-नॉयर क्राइम थ्रिलर
प्रीमियर: Cannes Film Festival
स्ट्रीमिंग: ZEE5

अंधेरी रात, जागती आंखें और एक टूटा हुआ सिस्टम

अनुराग कश्यप की फिल्म Kennedy महज एक क्राइम थ्रिलर नहीं, बल्कि सत्ता, अपराध और नैतिक पतन पर गहरी टिप्पणी है। यह कहानी है एक ऐसे पुलिस अधिकारी की, जिसे सिस्टम ने इतना तोड़ दिया कि वह खुद उसी अंधेरे का हिस्सा बन गया जिसके खिलाफ कभी खड़ा था।

फिल्म लॉकडाउन के बाद के मुंबई में घटती है, जहां सुनसान सड़कों और खाली इमारतों के बीच अपराध और राजनीति की सांठगांठ और भी भयावह लगती है। कश्यप इस सन्नाटे को सिर्फ बैकड्रॉप की तरह नहीं, बल्कि एक किरदार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

कहानी: एक ‘मरा हुआ’ पुलिसवाला जो जिंदा है

फिल्म का नायक एक पूर्व पुलिस अधिकारी है, जिसे सिस्टम में “मृत” घोषित कर दिया गया है। अब वह छद्म नाम से जीता है और सत्ता के इशारों पर काम करता है। उसके भीतर अपराधबोध, बदले की आग और मुक्ति की चाह एक साथ पलती है।

यह कहानी सीधी रेखा में नहीं चलती। इसमें फ्लैशबैक, आंतरिक संवाद और प्रतीकात्मक दृश्य हैं, जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करते हैं। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या भ्रष्ट व्यवस्था में ईमानदार रहना संभव है, या हर व्यक्ति अंततः उसी सड़ांध का हिस्सा बन जाता है?

राहुल भट्ट: नियंत्रित अभिनय का असर

राहुल भट्ट का प्रदर्शन फिल्म की रीढ़ है। वह संवादों से ज्यादा खामोशी से अभिनय करते हैं। उनका चेहरा, उनकी आंखें और शरीर की भाषा एक ऐसे व्यक्ति की कहानी कहती है जो अंदर से टूट चुका है, लेकिन बाहर से पत्थर बना हुआ है।

कई दृश्यों में उनका शांत, लगभग भावशून्य चेहरा अचानक विस्फोटक हो उठता है। यह संतुलन आसान नहीं होता, लेकिन भट्ट इसे बखूबी निभाते हैं। आलोचकों ने भी उनके अभिनय को फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बताया है।

सनी लियोन: रहस्य और संवेदना का मेल

सनी लियोन इस फिल्म में एक रहस्यमयी किरदार में नजर आती हैं। उनका रोल पारंपरिक ग्लैमर से अलग है। यहां वह एक भावनात्मक परत जोड़ती हैं, जो फिल्म के अंधेरे को थोड़ी मानवीय रोशनी देती है।

हालांकि उनका स्क्रीन टाइम सीमित है, लेकिन उनकी उपस्थिति कहानी को संतुलन देती है और नायक के मानवीय पक्ष को उजागर करती है।

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निर्देशन और तकनीक: नियो-नॉयर का भारतीय रूप

अनुराग कश्यप अपने विशिष्ट अंदाज में मुंबई को एक अलग ही रूप में पेश करते हैं। शहर यहां चमकता महानगर नहीं, बल्कि छाया और सन्नाटे से भरा एक जाल है।

कैमरा वर्क में गहरे रंग, कम रोशनी और लंबे शॉट्स का इस्तेमाल फिल्म को क्लासिक नियो-नॉयर एहसास देता है। बैकग्राउंड स्कोर तनाव को धीरे-धीरे बढ़ाता है, जिससे दर्शक लगातार असहज महसूस करता है।

फिल्म का संपादन जानबूझकर धीमा रखा गया है। यह व्यावसायिक मसाला सिनेमा नहीं, बल्कि धैर्य मांगने वाला सिनेमा है।

अंतरराष्ट्रीय पहचान और चर्चा

Kennedy का प्रीमियर Cannes Film Festival में हुआ, जहां इसे सराहना मिली। यह अनुराग कश्यप की उन फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्र सिनेमा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई।

भारत में इसे थिएटर रिलीज सीमित रूप में मिली, लेकिन अब यह ZEE5 पर उपलब्ध है, जिससे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच बनी है।

क्या कमजोरियां भी हैं?

फिल्म की धीमी गति और जटिल संरचना हर दर्शक को पसंद नहीं आ सकती। जो लोग तेज रफ्तार थ्रिलर या साफ-सुथरे निष्कर्ष की उम्मीद करते हैं, उन्हें यह फिल्म भारी लग सकती है।

लेकिन जो दर्शक चरित्र-प्रधान, विचारोत्तेजक और प्रतीकात्मक सिनेमा पसंद करते हैं, उनके लिए यह एक गंभीर अनुभव है।

अंतिम फैसला

Kennedy एक अंधेरी, बेचैन और गहन फिल्म है, जो सिस्टम की सड़ांध और इंसान की मुक्ति की तलाश को साथ लेकर चलती है। यह मनोरंजन से ज्यादा अनुभव है।

यदि आप मुख्यधारा से अलग, सोचने पर मजबूर करने वाला सिनेमा देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है।

रेटिंग (विश्लेषण आधारित): 3.5/5

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