OTT प्लेटफॉर्म Netflix पर रिलीज हुई फिल्म Toaster से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं। अनोखे कॉन्सेप्ट और मजबूत स्टारकास्ट के चलते यह फिल्म चर्चा में रही, लेकिन रिलीज के बाद इसे मिली-जुली से ज्यादा निराशाजनक प्रतिक्रियाएं मिली हैं। फिल्म एक डार्क कॉमेडी के रूप में पेश की गई है, लेकिन इसका ट्रीटमेंट और कहानी दर्शकों को पूरी तरह बांधने में सफल नहीं हो पाती।
कहानी में ‘Toaster’ से शुरू होकर अराजकता तक का सफर
फिल्म की कहानी एक साधारण सी लगने वाली घटना से शुरू होती है, जो धीरे-धीरे अजीब और उलझी हुई परिस्थितियों में बदल जाती है। एक व्यक्ति के लिए एक मामूली सा ‘Toaster’ इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह उसे वापस पाने के लिए हर हद पार करने को तैयार हो जाता है। यही जुनून कहानी को आगे बढ़ाता है, लेकिन बीच में कहानी का फोकस बिखर जाता है। डार्क कॉमेडी का तत्व मौजूद है, लेकिन कई जगह यह मजबूर और असंतुलित लगता है।
एक्टिंग: Sanya Malhotra और सपोर्टिंग कास्ट भी नहीं छोड़ पाई खास असर
Rajkummar Rao हमेशा की तरह अपने किरदार में गहराई लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके प्रदर्शन को सीमित कर देता है। Sanya Malhotra का किरदार दिलचस्प हो सकता था, लेकिन स्क्रीन टाइम कम होने के कारण वह पूरी तरह उभर नहीं पाता। इसके अलावा Archana Puran Singh की मौजूदगी के बावजूद फिल्म में कॉमिक इम्पैक्ट मजबूत नहीं बन पाता।
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निर्देशन और स्क्रीनप्ले: जहां फिल्म सबसे ज्यादा पिछड़ती है
फिल्म का निर्देशन आइडिया के स्तर पर अच्छा लगता है, लेकिन स्क्रीनप्ले इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आता है। डार्क कॉमेडी एक ऐसा जॉनर है जिसमें टाइमिंग, डायलॉग और सिचुएशन का संतुलन बेहद जरूरी होता है। ‘Toaster’ में यही संतुलन कई जगह टूटता नजर आता है। कई सीन अनावश्यक रूप से लंबे और खिंचे हुए लगते हैं, जिससे दर्शकों की दिलचस्पी कम होती जाती है।
क्या काम किया, क्या नहीं?
क्या अच्छा है:
- अलग और यूनिक कॉन्सेप्ट
- Rajkummar Rao की ईमानदार कोशिश
- कुछ सीन में डार्क ह्यूमर की झलक
क्या कमजोर है:
- कमजोर और बिखरी हुई स्क्रिप्ट
- हास्य का असंतुलित इस्तेमाल
- किरदारों का अधूरा विकास
- क्लाइमैक्स में प्रभाव की कमी
क्यों मुश्किल है डार्क कॉमेडी बनाना?
भारतीय सिनेमा में डार्क कॉमेडी अभी भी एक चुनौतीपूर्ण जॉनर है। इस तरह की फिल्मों में दर्शकों को हंसाने और सोचने पर मजबूर करने का संतुलन जरूरी होता है। ‘Toaster’ यह दिखाती है कि केवल नया आइडिया होना काफी नहीं है, बल्कि उसे मजबूत लेखन और सटीक निर्देशन के साथ पेश करना भी उतना ही जरूरी है।
देखें या छोड़ें? (Watch or Skip)
अगर आप एक्सपेरिमेंटल सिनेमा और डार्क कॉमेडी के शौकीन हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। लेकिन अगर आप मनोरंजन और मजबूत कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं करेगी।
निष्कर्ष: अच्छा कॉन्सेप्ट, लेकिन अधूरी फिल्म
Toaster एक दिलचस्प विचार के साथ शुरू होती है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और असंतुलित प्रस्तुति के कारण यह अपनी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। यह फिल्म एक बार फिर यह साबित करती है कि किसी भी कहानी की सफलता के लिए मजबूत लेखन सबसे अहम होता है।