Gunasekhar की ‘Euphoria’ का रिव्यू: सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्म, दमदार अभिनय लेकिन कमजोर दूसरा भाग

तेलुगु फिल्म निर्देशक Gunasekhar लंबे अंतराल के बाद अपनी नई फिल्म ‘Euphoria’ के साथ दर्शकों के सामने लौटे हैं। यह फिल्म युवाओं, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, पेरेंटिंग और अपराध जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को केंद्र में रखकर बनाई गई है। रिलीज के साथ ही फिल्म को लेकर दर्शकों और समीक्षकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

‘Euphoria’ फिल्म की कहानी का सार: जब एक कबूलनामा बन जाता है बड़ा सवाल

‘Euphoria’ फिल्म की कहानी एक प्रतिष्ठित कॉलेज की प्रिंसिपल विंध्या वेमुलापल्ली के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक एक गंभीर अपराध की जिम्मेदारी खुद पर ले लेती हैं और अदालत में आत्मसमर्पण कर देती हैं। यह घटना सबको चौंका देती है, क्योंकि उनके व्यक्तित्व और छवि से यह कदम बिल्कुल उलट नजर आता है।

यहीं से कहानी परत दर परत खुलती है और दर्शकों को यह समझने का मौका मिलता है कि इस फैसले के पीछे की असली वजह क्या है और इसका संबंध चैतरा नाम की एक छात्रा की जिंदगी से कैसे जुड़ा है।

युवाओं की दुनिया और पेरेंटिंग पर सवाल

‘Euphoria’ सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि आज की युवा पीढ़ी की मानसिक स्थिति, नशे की समस्या, अपराध की ओर बढ़ते कदम और माता-पिता की जिम्मेदारियों पर गंभीर टिप्पणी करती है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या आधुनिक पेरेंटिंग और सामाजिक दबाव अनजाने में युवाओं को गलत रास्ते पर धकेल रहे हैं।

अभिनय: भूमिका चावला का प्रभावशाली कमबैक

फिल्म में भूमिका चावला ने कॉलेज प्रिंसिपल के किरदार को बेहद गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ निभाया है। उनकी परफॉर्मेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है।
वहीं, सारा अर्जुन ने अपनी भूमिका में सहज अभिनय किया है और भावनात्मक दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं। सहायक कलाकारों का अभिनय भी कहानी को मजबूती देता है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

Gunasekhar का निर्देशन स्पष्ट संदेश देने की कोशिश करता है। फिल्म का पहला भाग तेज गति के साथ आगे बढ़ता है और दर्शकों को बांधे रखता है। छायांकन कहानी के मूड के अनुरूप है और बैकग्राउंड म्यूजिक भावनात्मक दृश्यों को प्रभावी बनाता है। हालांकि, संपादन में कसावट की कमी साफ नजर आती है।

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कमजोर कड़ी: दूसरा भाग और धीमी रफ्तार

फिल्म का दूसरा हिस्सा इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरता है। यहां कहानी की गति धीमी पड़ जाती है और कुछ दृश्य अनावश्यक रूप से खिंचे हुए महसूस होते हैं। इससे फिल्म का प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है और क्लाइमैक्स उतना असरदार नहीं बन पाता, जितनी उम्मीद की जाती है।

रेटिंग और समग्र मूल्यांकन

‘Euphoria’ एक संदेश प्रधान फिल्म है, जो गंभीर विषयों को छूती है, लेकिन पटकथा और लय में कमी के कारण पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाती।
यह फिल्म उन दर्शकों को ज्यादा पसंद आ सकती है, जो सामाजिक मुद्दों पर आधारित सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियों में रुचि रखते हैं।

निष्कर्ष

Gunasekhar की ‘Euphoria’ एक ईमानदार प्रयास है, जो आज की पीढ़ी और समाज से जुड़े अहम सवाल उठाती है। दमदार अभिनय और मजबूत विषय के बावजूद कमजोर दूसरा भाग इसे एक बेहतरीन फिल्म बनने से रोक देता है। फिर भी, कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा पसंद करने वालों के लिए यह फिल्म एक बार देखने लायक कही जा सकती है।

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